छठ पूजा: परंपरा और समरसता का आलोक

लोक आस्था की छठ पूजा

छठ पूजा, जिसे छठी मइया का त्योहार भी कहा जाता है, मुख्य रूप से बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और नेपाल के कुछ क्षेत्रों में मनाया जाने वाला एक महत्वपूर्ण सनातन वैदिक आर्य हिंदू पर्व है। यह प्रकृति और सूर्य की उपासना का पर्व हैजो चार दिनों तक चलता है। यह पर्व कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को मुख्य रूप से मनाया जाता है, इसलिए इसे छठ कहा जाता है। इस पर्व में छठी मइया (षष्ठी माता) की पूजा के साथ-साथ सूर्य देव (प्रत्यक्ष देव) की आराधना की जाती है।

छठी मइया कौन हैं?
छठी मइया को षष्ठी देवी के रूप में जाना जाता है। हिंदू मान्यताओं के अनुसार
, ये देवी प्रकृति का स्वरूप हैं और बच्चों की रक्षा करने वाली मानी जाती हैं। इन्हें माता पार्वती का एक रूप भी माना जाता है। छठी मइया को संतान की रक्षा, दीर्घायु और परिवार की सुख-समृद्धि की देवी के रूप में पूजा जाता है। मान्यता है कि छठी मइया भक्तों की मनोकामनाएं पूरी करती हैं और विशेष रूप से संतान प्राप्ति और उनके कल्याण के लिए इनकी पूजा की जाती है।

क्यों किया जाता है यह कठिन व्रत ?
छठ व्रत करने वाले मुख्य रूप से संतान प्राप्ति (पुत्र या पुत्री की कामना), संतान की लंबी आयु और स्वास्थ्य, परिवार की सुख-समृद्धि, रोगों से मुक्ति, कार्य सिद्धि (नौकरी, व्यापार, परीक्षा आदि में सफलता), विवाह में बाधा दूर करना, कर्ज से मुक्ति, कुल-परंपरा की रक्षा, तथा पूर्वजों की आत्मा की शांति जैसी मनोकामनाओं की सिद्धि के लिए इस त्योहार को मनाते हैं। विशेष रूप से नि:संतान दंपति पुत्र प्राप्ति के लिए, माता-पिता संतान की सुरक्षा के लिए, और बीमार या कष्ट में जी रहे लोग आरोग्य की कामना से कठोर निर्जला उपवास करते हैं। पौराणिक मान्यता है कि सूर्य देव और छठी मइया इन कामनाओं को पूर्ण करते हैं, यदि व्रत पूर्ण श्रद्धा, शुद्धता और नियमों के साथ किया जाए।

सूर्य से छठी मइया का संबंध:
छठ पूजा में सूर्य देव की उपासना का विशेष महत्व है। सूर्य को प्रकृति का आधार और जीवन का स्रोत माना जाता है। हिंदू धर्म में सूर्य को प्रत्यक्ष देवता के रूप में पूजा जाता है, क्योंकि वे जीवन, ऊर्जा और स्वास्थ्य के प्रतीक हैं। छठी मइया को सूर्य की शक्ति या उनकी बहन के रूप में देखा जाता है।
कुछ मान्यताओं में छठी मइया को सूर्य की पत्नी उषा (सूर्योदय की देवी) और प्रत्युषा (सूर्यास्त की देवी) से भी जोड़ा जाता है। इस पर्व में उगते और डूबते सूर्य को अर्घ्य देने की प्रथा है
, जो सूर्य और छठी मइया के बीच गहरे संबंध को दर्शाता है।

छठ पूजा: भक्त और भगवान का सीधा संबंध:छठ पूजा एक ऐसा पवित्र पर्व है जो भक्ति की स्वतंत्रता और आध्यात्मिक सरलता का प्रतीक है, जहां भक्त और भगवान के बीच कोई मध्यस्थ नहीं होता। इस त्योहार में किसी पंडित या पुरोहित की आवश्यकता नहीं पड़ती; भक्त अपनी मातृभाषा में, अपनी भावनाओं के साथ, सूर्य देव और छठी मइया की स्तुति करते हैं। यह सीधा और अंतरंग संबंध भक्तों को एक अनूठी आध्यात्मिक स्वतंत्रता प्रदान करता है, जहां वे बिना किसी औपचारिकता या जटिल अनुष्ठानों के अपनी श्रद्धा व्यक्त कर सकते हैं। पुरोहित केवल तिथि और कुछ सामान्य मार्गदर्शन तक सीमित रहते हैं, जिससे इस पर्व की आत्मा भक्तों के हृदय और उनकी निश्छल भक्ति में निहित रहती है। यह स्वतंत्रता भक्तों को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ती है और उनकी भावनाओं को सहज रूप से व्यक्त करने का अवसर देती है, जिससे छठ पूजा न केवल एक धार्मिक अनुष्ठान, बल्कि आत्मिक मुक्ति और भक्ति की स्वच्छंद अभिव्यक्ति का उत्सव बन जाता है। 

छठ पूजा का प्रारंभ और इतिहास:

छठ पूजा की शुरुआत के बारे में कई पौराणिक और ऐतिहासिक कथाएं प्रचलित हैं:

ऐतिहासिक कथा:
रामायण:
कहा जाता है कि भगवान राम और माता सीता ने लंका विजय के बाद अयोध्या लौटने पर कार्तिक शुक्ल षष्ठी को सूर्य की उपासना की थी। यह छठ पूजा का प्रारंभिक रूप हो सकता है।

महाभारत: एक अन्य कथा के अनुसार, द्रौपदी और पांडवों ने अपने कष्टों के निवारण के लिए सूर्य और छठी मइया की पूजा की थी। द्रौपदी ने छठ व्रत रखकर पांडवों के लिए सुख-समृद्धि और विजय प्राप्त की थी।

ऋषियों की परंपरा: कुछ मान्यताओं के अनुसार, वैदिक काल में ऋषि-मुनियों ने सूर्य उपासना के साथ प्रकृति की पूजा शुरू की, जो बाद में छठ पूजा के रूप में विकसित हुई।

ऐतिहासिक दृष्टिकोण: छठ पूजा का प्रारंभ प्राचीन काल में सूर्य उपासना और प्रकृति पूजा से जुड़ा है। यह पर्व विशेष रूप से मगध क्षेत्र (आधुनिक बिहार) में प्रचलित हुआ। माना जाता है कि यह पर्व वैदिक काल से चला आ रहा है, लेकिन इसका वर्तमान स्वरूप मध्यकाल में और अधिक लोकप्रिय हुआ।

कुछ विद्वानों का मानना है कि छठ पूजा का संबंध सूर्य मंदिरों (जैसे बिहार के औरंगाबाद जिले में देव सूर्य मंदिर) और प्राचीन सूर्य उपासना परंपराओं से है।

वैदिक और पौराणिक आधार

इसकी मूल भावना—सूर्य और छठी मइया की उपासना, संतान कल्याण, और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता—वैदिक मंत्रों और पौराणिक कथाओं में स्पष्ट है। ये मंत्र और श्लोक छठ पूजा की सहजता, भक्ति और आध्यात्मिक गहराई को समृद्ध करते हैं। वैदिक मंत्र और छठ पूजा वैदिक साहित्य, विशेषकर ऋग्वेद, यजुर्वेद, और सामवेद, में सूर्य को जीवनदाता और प्रकृति का आधार माना गया है। निम्नलिखित मंत्र छठ पूजा की सूर्य उपासना और सहज भक्ति से जुड़ते हैं।

ऋग्वेद (1.50.10) - सूर्य की सर्वसुलभता 

मंत्र:
चित्रं विश्वस्य भूतस्य चक्षुः सूर्यो विश्वं प्रति मुञ्चति रश्मिम्।
विश्वं सूर्यो विश्वेन संनादति यदेत्युद्यति विश्वमस्ति॥

हिंदी अनुवाद: सूर्य विश्व का नेत्र है, जो सभी प्राणियों को प्रकाश देता है। उनकी किरणें विश्व को प्रेरित करती हैं, और उनके उदय होने पर सब जीवंत हो उठता है। 

छठ पूजा से संबंध: यह मंत्र सूर्य की सर्वव्यापी और जीवनदायी शक्ति को दर्शाता है, जो छठ पूजा में डूबते और उगते सूर्य को अर्घ्य अर्पित करने की प्रथा से मेल खाता है। यह पर्व की सहजता को रेखांकित करता है, जहां कोई भी व्यक्ति, बिना मंत्रों के ज्ञान के, श्रद्धापूर्वक सूर्य की पूजा कर सकता है।
यजुर्वेद (20.46) - सूर्य उपासना की सरलता  
मंत्र: 
तच्चक्षुर्देव हितं पुरस्ताच्छु क्रमुच्चरत्। पश्येम शरदः शतं जीवेम शरदः शतम्॥

हिंदी अनुवाद: सूर्य, जो देवताओं के लिए हितकारी और शुद्ध प्रकाश वाला है, पूर्व से उदय होता है। हम उसे सौ वर्ष तक देखें और सौ वर्ष तक जिएं। 

छठ पूजा से संबंध: यह मंत्र सूर्य उपासना को स्वास्थ्य और दीर्घायु के लिए सरल और प्रभावी बताता है। छठ पूजा में व्रती बिना जटिल अनुष्ठानों के जल अर्पित करते हैं, जो इस मंत्र की भावना को प्रतिबिंबित करता है। यह संध्या और उषा अर्घ्य के समय विशेष रूप से प्रासंगिक है।

सूर्य गायत्री मंत्र (ऋग्वेद 3.62.10 से प्रेरित)  
मंत्र: 
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्॥ (गुरु आज्ञा से ही उच्चारण करें) 

हिंदी अनुवाद: हम सवित्र देव (सूर्य) के तेजस्वी स्वरूप का ध्यान करते हैं, जो हमारी बुद्धि को प्रेरित करें। 

छठ पूजा से संबंध: यह मंत्र सूर्य की ऊर्जा और बुद्धि प्रदान करने वाली शक्ति को दर्शाता है। छठ पूजा में व्रती इसे या सरल मंत्र जैसे "ॐ सूर्याय नमः" का जाप कर सकते हैं, जो पर्व की समावेशी और सहज प्रकृति को रेखांकित करता है।

कथाएं पुराणों में सूर्य और षष्ठी देवी की पूजा का उल्लेख छठ पूजा की पौराणिक जड़ों को समर्थन देता है।

आदित्य हृदय स्तोत्र (वाल्मीकि रामायण
, युद्धकांड) 
मंत्र (प्रारंभिक श्लोक): 
ततो युद्धपरिश्रान्तं समरे चिन्तया स्थितम्। रावणं चाग्रतो दृष्ट्वा युद्धाय समुपस्थितम्। 
दैवतैश्च समागम्य द्रष्टुमभ्यागतो रणम्। उपगम्याब्रवीद् राममगस्त्यो भगवान् ऋषिः॥
आदित्यहृदयं पुण्यं सर्वशत्रुविनाशनम्। जयावहं जपेन्नित्यं अक्षय्यं परमं शिवम्॥

हिंदी अनुवाद: युद्ध में थके और चिंतित श्रीराम को देखकर, ऋषि अगस्त्य ने उन्हें आदित्य हृदय स्तोत्र का उपदेश दिया, जो पवित्र, शत्रु-विनाशक और विजयकारी है। 

छठ पूजा से संबंध: यह स्तोत्र सूर्य उपासना की महत्ता को दर्शाता है। माना जाता है कि श्रीराम और सीता ने अयोध्या लौटकर सूर्य और प्रकृति की पूजा की, जो छठ पूजा का प्रारंभिक रूप हो सकता है। यह संध्या और उषा अर्घ्य से जुड़ता है।

देवी भागवत पुराण - षष्ठी देवी की स्तुति  
मंत्र: 
षष्ठी देवी नमस्तुभ्यं सर्वसिद्धिप्रदायिनी। पुत्रपौत्रादि दायिनी सर्वं मंगलदायिनी॥

हिंदी अनुवाद: हे षष्ठी देवी, आपको नमस्कार! आप सिद्धियां, पुत्र-पौत्र और सर्वमंगल प्रदान करती हैं। 

छठ पूजा से संबंध: षष्ठी देवी को संतान की रक्षक माना जाता है, जो छठ पूजा में छठी मइया की पूजा से जुड़ता है। व्रती इस पर्व में संतान की दीर्घायु और समृद्धि के लिए प्रार्थना करते हैं।

छठ पूजा से मंत्रों का संबंध वैदिक मंत्र: ऋग्वेद (1.50.10), यजुर्वेद (20.46), और सूर्य गायत्री मंत्र सूर्य की सर्वसुलभता और सरल उपासना को दर्शाते हैं, जो छठ पूजा की बिना पुरोहित और सहज भक्ति की प्रथा से मेल खाते हैं।

पौराणिक मंत्र: आदित्य हृदय स्तोत्र और षष्ठी देवी की स्तुति सूर्य और छठी मइया की पूजा को पौराणिक आधार प्रदान करते हैं, जो संतान कल्याण और प्रकृति पूजा की भावना को प्रबल करते हैं।

जाप और उपयोग की सलाह वैदिक मंत्र: सूर्योदय या सूर्यास्त के समय जल में खड़े होकर 11, 21 या 108 बार जाप करें। 
सरल मंत्र जैसे "ॐ सूर्याय नमः" या "ॐ छठी मइया नमः" भी उपयुक्त हैं। 

पौराणिक मंत्र: आदित्य हृदय स्तोत्र का पाठ संध्या/उषा अर्घ्य के समय और षष्ठी देवी की स्तुति खरना या अर्घ्य के समय करें।

सहजता: छठ पूजा में भक्ति की सहजता सर्वोपरि है। व्रती लोकगीत (जैसे "उगु न सूरज देव") या बिना मंत्र के प्रार्थना कर सकते हैं।

छठ पूजा का स्वरूप और रीति-रिवाज:
छठ पूजा चार दिनों तक चलती है और इसमें कठिन व्रत और अनुष्ठान शामिल हैं:

नहाय-खाय: छठ पूजा का प्रथम दिन - पवित्रता और भक्ति का प्रारंभ:छठ पूजा का प्रथम दिन, जिसे नहाय-खाय के नाम से जाना जाता है, इस पवित्र पर्व की शुरुआत पवित्रता और भक्ति के संकल्प के साथ करता है। इस दिन, व्रती—स्त्री और पुरुष दोनों—परंपरागत रूप से गंगा या अन्य पवित्र नदियों, समुद्री तटों, सरोवरों या तालाबों में स्नान कर अपने तन-मन को शुद्ध करते हैं। स्नान के पश्चात, वे स्वच्छ वस्त्र धारण करते हैं और शुद्ध शाकाहारी भोजन, जैसे चावल, दाल और कद्दू की सब्जी, तैयार करते हैं, जो सादगी और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता का प्रतीक है। परंपरा के अनुसार, यह भोजन पहले भगवान सूर्य को अर्पित किया जाता है, और फिर व्रती स्वयं इसे प्रसाद के रूप में ग्रहण करते हैं। आधुनिक समय में, विशेषकर बड़े शहरों में जहां प्राकृतिक जलाशयों की कमी है, व्रती स्विमिंग पूल, कृत्रिम तालाबों, या घर-आंगन में उपलब्ध संसाधनों जैसे ट्यूबवेल, कुएं या नल के जल से स्नान करते हैं। यह प्रसाद न केवल शारीरिक शुद्धता को दर्शाता है, बल्कि छठी मइया और सूर्य देव के प्रति गहन श्रद्धा और आत्मिक तैयारी को भी व्यक्त करता है। नहाय-खाय का यह दिन व्रत की कठिन यात्रा के लिए व्रती को आध्यात्मिक और शारीरिक रूप से तैयार करता है, जो भक्ति, संयम और प्रकृति के साथ सामंजस्य का संदेश देता है।

खरना: छठ पूजा का दूसरा दिन - भक्ति की गहन साधना: छठ पूजा का दूसरा दिन, खरना, भक्ति की गहराई, आत्मिक संयम और छठी मइया के प्रति पूर्ण समर्पण का प्रतीक है। इस दिन व्रती सूर्यास्त तक कठोर निर्जल उपवास रखते हैं, अपनी सांसारिक इच्छाओं का त्याग कर मन, वचन और कर्म से पवित्रता की ओर अग्रसर होते हैं। सायंकाल में, व्रती श्रद्धापूर्वक गुड़ की खीर और रोटी का पवित्र प्रसाद तैयार करते हैं, जो सादगी और प्रकृति की देन का सम्मान दर्शाता है। यह प्रसाद पहले छठी मइया को अर्पित किया जाता है, जिसके माध्यम से व्रती अपनी निश्छल भक्ति और कृतज्ञता व्यक्त करते हैं। प्रसाद ग्रहण करने से पहले, व्रती का मन छठी मइया के प्रति अटूट विश्वास और आध्यात्मिक उल्लास से सराबोर हो जाता है। परिवारजनों और समुदाय के साथ प्रसाद बांटने का यह क्षण सामाजिक एकता और साझा आनंद का उत्सव बनता है। खरना का यह अनुष्ठान न केवल शारीरिक संयम को प्रबल करता है, बल्कि आत्मा की शुद्धता, भक्ति की गहन अनुभूति और छठी मइया के प्रति असीम श्रद्धा को प्रज्वलित करता है, जो इस पर्व की आध्यात्मिक यात्रा को और सशक्त बनाता है।

संध्या अर्घ्य-छठ पूजा का तीसरा दिनजिसे संध्या अर्घ्य के रूप में जाना जाता है, इस पवित्र पर्व का सबसे महत्वपूर्ण और भावनात्मक रूप से गहन दिन है। इस दिन व्रती कठोर निर्जल उपवास रखते हैं, जो सुबह से शुरू होकर अगले दिन सूर्योदय तक चलता है। सूर्यास्त के समय, भक्त नदियों, तालाबों या जलाशयों में खड़े होकर डूबते सूर्य को अर्घ्य अर्पित करते हैं। यह अर्घ्य बांस की सूप में सजाए गए फल, ठेकुआ, मिठाई और अन्य प्रसाद के साथ दिया जाता है, जो प्रकृति और सूर्य देव के प्रति कृतज्ञता और समर्पण का प्रतीक है। व्रती का यह कठिन व्रत, जिसमें वे दिन-रात बिना जल और भोजन के रहते हैं, उनकी अटूट भक्ति और आत्मिक शक्ति को दर्शाता है। संध्या अर्घ्य के बाद भी, रातभर व्रती कुछ भी भोजन या जल ग्रहण नहीं करते, बल्कि भक्ति भजन, छठी मइया के लोकगीत और प्रार्थनाओं में लीन रहते हैं। यह रात्रि उनके लिए एक आध्यात्मिक साधना का समय है, जहां वे सूर्य और छठी मइया की कृपा के लिए प्रार्थना करते हैं। संध्या अर्घ्य का यह अनुष्ठान न केवल सूर्य की जीवनदायी ऊर्जा के प्रति श्रद्धा व्यक्त करता है, बल्कि व्रती के संयम, त्याग और भक्ति की गहन अनुभूति को भी उजागर करता है, जो इस पर्व को अनुपम और पवित्र बनाता है।

उषा अर्घ्य: छठ पूजा का चौथा दिन - भक्ति की पूर्णता और व्रत का समापन: छठ पूजा का चौथा और अंतिम दिन, उषा अर्घ्य, इस पवित्र पर्व का समापन और भक्ति की चरम परिणति का प्रतीक है। इस दिन, व्रती प्रभातकाल में उगते सूर्य को जल में खड़े होकर अर्घ्य अर्पित करते हैं, जो जीवन, ऊर्जा और नई शुरुआत का प्रतीक है। बांस की सूप में सजे फल, ठेकुआ और अन्य प्रसाद के साथ यह अर्घ्य सूर्य देव और छठी मइया के प्रति गहन कृतज्ञता और समर्पण को व्यक्त करता है। इस समय तक व्रती लगातार तीसरे दिन से चले आ रहे कठोर निर्जल उपवास में रहते हैं, जो उनकी अटूट भक्ति, त्याग और आत्मिक शक्ति को दर्शाता है। उषा अर्घ्य के पश्चात, व्रती प्रसाद ग्रहण करके अपना व्रत तोड़ते हैं, जो न केवल शारीरिक उपवास का समापन है, बल्कि आध्यात्मिक साधना की पूर्णता और सूर्य की कृपा से प्राप्त आशीर्वाद का प्रतीक है। यह क्षण परिवार और समुदाय के लिए आनंद और एकता का अवसर होता है, जब सभी मिलकर प्रसाद बांटते हैं और छठी मइया से संतान की दीर्घायु, स्वास्थ्य और समृद्धि की कामना करते हैं। उषा अर्घ्य का यह अनुष्ठान छठ पूजा की भावनात्मक गहराई और प्रकृति के साथ अटूट संबंध को उजागर करता है, जो इसे एक अनुपम आध्यात्मिक उत्सव बनाता है।

प्रकृति के प्रति कृतज्ञता: छठ पूजा का पर्यावरणीय संदेशछठ पूजा केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रति गहन कृतज्ञता और सम्मान का उत्सव है। इस पर्व में सूर्य, जल और पृथ्वी—प्रकृति के इन मूल तत्वों—की पूजा के माध्यम से पर्यावरण के प्रति गहरा आभार व्यक्त किया जाता है। सूर्य को जीवन का स्रोत, जल को पवित्रता और शुद्धि का प्रतीक, और पृथ्वी को समृद्धि की आधारशिला माना जाता है। व्रती नदियों, तालाबों या जलाशयों में खड़े होकर सूर्य को अर्घ्य अर्पित करते हैं और बांस की सूप में फल, ठेकुआ व अन्य प्राकृतिक प्रसाद चढ़ाते हैं, जो प्रकृति के साथ अटूट संबंध को दर्शाता है। इस दौरान जलाशयों की स्वच्छता और संरक्षण के लिए सामुदायिक प्रयास किए जाते हैं, जो पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता को बढ़ाते हैं। छठ पूजा का यह पहलू न केवल भक्तों को प्रकृति के महत्व का स्मरण कराता है, बल्कि उन्हें इसके संरक्षण और सम्मान की प्रेरणा देता है, जिससे यह पर्व आध्यात्मिकता के साथ-साथ पर्यावरणीय चेतना का भी प्रतीक बन जाता है।

संतान और स्वास्थ्य: छठ पूजा का हृदयस्पर्शी उद्देश्य: छठ पूजा एक ऐसा पवित्र पर्व है, जो संतान की दीर्घायु, स्वास्थ्य और समृद्धि के लिए विशेष रूप से समर्पित है, और यह भक्तों के हृदय में गहरी आस्था और ममता का भाव जागृत करता है। इस पर्व में छठी मइया, जो संतान की रक्षक और कल्याणकारी देवी मानी जाती हैं, के साथ-साथ सूर्य देव की उपासना की जाती है, जिन्हें जीवन, ऊर्जा और स्वास्थ्य का स्रोत माना जाता है। व्रती कठोर निर्जल उपवास और सूर्य को अर्घ्य अर्पित करने की प्रक्रिया के माध्यम से अपनी संतान के लिए दीर्घायु, निरोगी जीवन और समृद्ध भविष्य की प्रार्थना करते हैं। बांस की सूप में सजे फल, ठेकुआ और अन्य प्रसाद, जो प्रकृति की देन हैं, छठी मइया को अर्पित किए जाते हैं, जो मातृत्व और पारिवारिक सुख की भावना को प्रबल करते हैं। यह पर्व न केवल शारीरिक स्वास्थ्य, बल्कि मानसिक और आध्यात्मिक शांति की कामना को भी समेटे हुए है, जिससे परिवार और समुदाय में सकारात्मकता और एकता का संचार होता है। छठ पूजा का यह पहलू इसे एक भावनात्मक और आध्यात्मिक यात्रा बनाता है, जो हर माता-पिता के हृदय में संतान के प्रति प्रेम और कृतज्ञता को और गहरा करता है।

सामाजिक समरसता: एकता का संदेशछठ पूजा आध्यात्मिकता, पर्यावरणीय चेतना और सामाजिक समरसता का अनुपम संगम है। इस पर्व में समाज के सभी वर्ग—अमीर-गरीब, विभिन्न जातियों और समुदायों के लोग—नदियों, तालाबों और जलाशयों के किनारे एकत्र होकर सूर्य और छठी मइया को अर्घ्य अर्पित करते हैं। बांस की सूप में सजे प्रसाद और भक्ति भजनों के साथ यह सामूहिक पूजा सामाजिक भेदभाव को मिटाकर समानता का भाव जागृत करती है। भजन-कीर्तन और प्रसाद वितरण जैसे सामुदायिक आयोजन आपसी प्रेम और सहयोग को बढ़ाते हैं, जिससे छठ पूजा न केवल आस्था, बल्कि सामाजिक एकता और मानवीय मूल्यों का प्रतीक बन जाती है।

विभिन्न जातियों और वर्गों का योगदान
छठ पूजा सामाजिक समरसता और आर्थिक समृद्धि का प्रतीक है, जिसमें समाज के विविध वर्ग अपनी-अपनी भूमिकाओं से पर्व को समृद्ध करते हैं।

मल्लाह समुदाय:
जलाशयों की सफाई और नाव सेवाओं के माध्यम से पूजा के लिए पवित्र और सुरक्षित वातावरण तैयार करते हैं
, जो पर्यावरण संरक्षण और सामुदायिक सेवा को दर्शाता है।

डोम समुदाय: बांस की सूप और चटाई जैसी पूजा सामग्री बनाते हैं, जिससे उनकी कारीगरी का सम्मान बढ़ता है और सामाजिक भेदभाव मिटता है।

पासी समुदाय: नारियल जैसी प्रसाद सामग्री की आपूर्ति करता है, जो पर्व की धार्मिक पूर्णता में योगदान देता है और समुदायों की एकता को दर्शाता है।

किसान समुदाय: गन्ना, कद्दू, गेहूं और चावल जैसे कृषि उत्पाद प्रदान करते हैं, जो प्रकृति और मानव के संबंध को मजबूत करते हैं। 

यादव और गौपालक समुदाय: दूध और घी की आपूर्ति करते हैं, जो ठेकुआ और खीर जैसे प्रसाद के लिए आवश्यक हैं। इनका योगदान पर्व की सांस्कृतिक और धार्मिक परंपराओं को समृद्ध करता है, क्योंकि घी और दूध प्रसाद की पवित्रता और स्वाद को बढ़ाते हैं। 

वैश्य (वणिक) समुदाय: पूजा सामग्री, वस्त्र, फल और प्रसाद को बाजारों के माध्यम से व्रतियों तक पहुंचाते हैं, जो विभिन्न समुदायों को जोड़ने का सेतु बनता है। 

बुनकर और दरजी समुदाय: नए वस्त्र बुनकर और सिलकर पर्व के सौंदर्य को बढ़ाते हैं, जो सभी वर्गों द्वारा उपयोग किए जाते हैं। 

सोनार समुदाय: आभूषण तैयार कर व्रतियों के उत्साह और पर्व की शोभा को दोगुना करते हैं। 

कुम्हार समुदाय: मिट्टी के दीप, छांछ और हथिया जैसे बर्तन बनाकर परंपराओं को जीवित रखते हैं। 

अन्य समुदाय: नाई (मेहंदी और सज्जा), लोहार (उपकरण), हलवाई (ठेकुआ और मिठाई), और गवैया (भजन-कीर्तन) जैसे योगदान पर्व को और जीवंत बनाते हैं।

ये विविध योगदान सामाजिक भेदों को मिटाकर सहयोग और एकता का संदेश देते हैं। छठ पूजा के दौरान सामग्री और सेवाओं की मांग से स्थानीय अर्थव्यवस्था को बल मिलता है, जिससे किसानों, कारीगरों और व्यापारियों को आर्थिक लाभ होता है। यह पर्व सामुदायिक एकता और परस्पर निर्भरता को बढ़ावा देता है, जिससे समाज में सौहार्द और समृद्धि का वातावरण बनता है।

छठ पूजा और श्रमिक प्रवासभारत में औद्योगीकरण और रोजगार के अवसरों की तलाश में बिहार, झारखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश जैसे क्षेत्रों से बड़ी संख्या में श्रमिक दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु, गुजरात, पंजाब और अन्य औद्योगिक केंद्रों की ओर पलायन करते हैं। ये श्रमिक, जो मुख्य रूप से मजदूरी, निर्माण, उद्योग या सेवा क्षेत्रों में कार्यरत हैं, प्रारंभ में अपनी जन्मभूमि या पैतृक गांव लौटकर छठ पूजा मनाते हैं। हालांकि, समय के साथ, परिवहन की कठिनाइयों, आर्थिक दबाव और अपने कार्यस्थल पर स्थायित्व के कारण, वे अपने परिवारों को भी अपने कर्मभूमि पर ले आते हैं। इसके बाद, वे अपने मूल क्षेत्र की सांस्कृतिक और सामाजिक परंपराओं को जीवित रखने के लिए स्थानीय सामाजिक संगठनों से जुड़कर छठ पूजा को अपने कर्मभूमि पर ही मनाने लगते हैं।छठ पूजा का कर्मभूमि पर विस्तारमुंबई, दिल्ली, बेंगलुरु, सूरत, अहमदाबाद जैसे महानगरों और औद्योगिक राज्यों में छठ पूजा अब बड़े पैमाने पर मनाई जाती है। इन शहरों में प्रवासी समुदायों ने अपने सामाजिक संगठनों, जैसे बिहार फाउंडेशन, पूर्वांचल समाज या स्थानीय सांस्कृतिक समितियों, के माध्यम से छठ पूजा को संगठित रूप दिया है। उदाहरण के लिए:
  • मुंबई: जूहू, वर्सोवा, वसई, विरार, नालासोपारा, ठाणे, मुंबई, पालघर के समुद्र तट अथवा अन्य प्राकृतिक जलाशयों पर हजारों प्रवासी श्रमिक और उनके परिवार छठ पूजा के लिए एकत्रित होते हैं। स्थानीय प्रशासन भी घाटों की व्यवस्था और सुरक्षा सुनिश्चित करता है।
  • दिल्ली: यमुना नदी के किनारे और कृत्रिम घाटों पर छठ पूजा का आयोजन होता है, जहां प्रवासी समुदाय बड़े उत्साह से भाग लेता है।
  • बेंगलुरु और गुजरात: यहां भी प्रवासी समुदाय स्थानीय जलाशयों या कृत्रिम तालाबों में सूर्य को अर्घ्य अर्पित करते हैं और सामुदायिक आयोजनों के माध्यम से पर्व को जीवंत रखते हैं।
यह प्रवृत्ति न केवल सांस्कृतिक निरंतरता को दर्शाती है, बल्कि यह भी दिखाती है कि छठ पूजा अब एक क्षेत्रीय पर्व से राष्ट्रीय और वैश्विक स्तर का उत्सव बन चुका है। विदेशों में, जैसे दुबई, अमेरिका और कनाडा में बसे प्रवासी भारतीय भी इस पर्व को मनाते हैं, जिससे इसकी वैश्विक पहचान बढ़ी है।आर्थिक प्रभाव और पर्यटनछठ पूजा का आर्थिक प्रभाव दो दृष्टिकोणों से देखा जा सकता है:
  1. मूल क्षेत्रों में पर्यटन: बिहार, झारखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश जैसे क्षेत्रों में छठ पूजा के दौरान प्रवासी श्रमिक अपने गांव लौटते हैं, जिससे स्थानीय पर्यटन को बढ़ावा मिलता है। रेलवे, बस सेवाएं, स्थानीय बाजार और आतिथ्य उद्योग में इस दौरान उछाल देखने को मिलता है। लोग अपने परिवारों के साथ पर्व मनाने के लिए नदियों, तालाबों और घाटों पर एकत्र होते हैं, जिससे स्थानीय अर्थव्यवस्था को लाभ होता है।
  2. कर्मभूमि पर आर्थिक योगदान: जिन शहरों में प्रवासी श्रमिक छठ पूजा मनाते हैं, वहां इस पर्व के दौरान खरीदारी में वृद्धि होती है। प्रसाद के लिए सामग्री (जैसे बांस की सूप, फल, ठेकुआ, मिठाई), पूजा सामग्री, नए कपड़े और घरेलू सामान की खरीद से स्थानीय बाजारों में मांग बढ़ती है। यह उन राज्यों और शहरों की अर्थव्यवस्था को मजबूत करता है, जहां प्रवासी श्रमिक कार्यरत हैं। उदाहरण के लिए, दिल्ली और मुंबई जैसे शहरों में छठ पूजा के दौरान बाजारों में विशेष दुकानें और स्टॉल देखे जा सकते हैं।
सरकारी सहयोग और सामाजिक महत्वविभिन्न राज्यों की सरकारें छठ पूजा के महत्व को समझती हैं और इसे सुचारु रूप से संपन्न कराने के लिए कई कदम उठाती हैं। 
उदाहरण के लिए:
  • घाटों की व्यवस्था: दिल्ली और मुंबई जैसे शहरों में सरकारें नदियों और तालाबों के किनारे विशेष घाट बनवाती हैं और स्वच्छता सुनिश्चित करती हैं।
  • सुरक्षा और यातायात प्रबंधन: पूजा स्थलों पर सुरक्षा बल तैनात किए जाते हैं और यातायात व्यवस्था को सुचारु रखा जाता है।
  • सांस्कृतिक आयोजन: कई शहरों में स्थानीय प्रशासन और सामाजिक संगठन मिलकर सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन करते हैं, जो सामुदायिक एकता को बढ़ावा देते हैं।
राज्य सरकारें इस पर्व को केवल धार्मिक आयोजन के रूप में ही नहीं, बल्कि सामाजिक समरसता और आर्थिक विकास के अवसर के रूप में भी देखती हैं। छठ पूजा प्रवासी समुदायों को उनकी जड़ों से जोड़े रखने का एक सशक्त माध्यम है, जो विभिन्न संस्कृतियों के बीच एक सेतु का कार्य करता है।
 
छठ व्रत किसे करना चाहिए?
छठ व्रत मुख्य रूप से वे लोग करते हैं जो: संतान की कामना रखते हैं, संतान की लंबी आयु, स्वास्थ्य और सुरक्षा चाहते हैं, गंभीर रोगों से मुक्ति या कष्ट निवारण की मनोकामना रखते हैं, परिवार की सुख-समृद्धि, वैभव और कुल-परंपरा की रक्षा चाहते हैं।

यह व्रत महिलाएँ (विशेषकर माताएँ) अधिक करती हैं, लेकिन पुरुष भी कर सकते हैं। विवाहित दंपति मिलकर भी करते हैं। नि:संतान दंपति, बीमार बच्चों के माता-पिता, या कठिन परिस्थितियों में जी रहे लोग इसे विशेष रूप से अपनाते हैं।

क्या यह व्रत सभी सनातनी, वैदिक, आर्य हिंदू समाज को करना चाहिए?
हाँ, क्योंकि: 
वैदिक मूल: छठ सूर्य उपासना का पर्व है, जो ऋग्वेद में वर्णित सूर्य देव की स्तुति (गायत्री मंत्र, आदित्य हृदय स्तोत्र) से जुड़ा है।
षष्ठी देवी (छठी मइया) - का उल्लेख मार्कण्डेय पुराण, ब्रह्मवैवर्त पुराण और स्कंद पुराण में मिलता है।
निर्जला उपवास, नदी स्नान, अर्घ्य दान – ये वैदिक यज्ञ परंपरा के अंग हैं।

रामायण - महाभारत काल से संबंध: 
सीता माता ने वनवास के बाद सूर्य षष्ठी व्रत किया था (वाल्मीकि रामायण के अनुसार)।
द्रौपदी : ने पांडवों की रक्षा के लिए सूर्य उपासना की थी (महाभारत)।
कर्ण सूर्य पुत्र थे और सूर्य को अर्घ्य देते थे – यही परंपरा छठ में जीवित है।

प्रकृति पूजा और पर्यावरण संरक्षण: नदियों की पवित्रता, सूर्य की ऊर्जा, फल-अन्न का प्रसाद – यह वैदिक जीवन दर्शन है, जो सभी हिंदुओं के लिए प्रासंगिक है।

इसे केवल बिहार - झारखंड - यूपी तक सीमित रखना कितना उचित?

बिलकुल अनुचित और संकीर्ण दृष्टिकोण है।
कारण: बिंदु                               स्पष्टीकरण
ऐतिहासिक विस्तार                       प्राचीन काल में आर्यावर्त (उत्तर भारत) में सूर्य उपासना सर्वत्र थी। मगध,                                                     कोसल, मिथिला में यह प्रचलित था – आज का बिहार-यूपी ही उसका केंद्र                                                    रहा।
प्रवास का प्रभाव                          बिहारी-पूर्वांचली लोग दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, अमेरिका, मॉरीशस तक ले                                                 गए – वहाँ भी छठ मनता है। यह प्रवास नहीं, प्रसार है।
सार्वभौमिकता                             जैसे दिवाली, होली, नवरात्रि पूरे भारत में मनते हैं, वैसे ही छठ भी सूर्य-षष्ठी                                                    पूजा है – इसे क्षेत्रीय कहना वैदिक एकता को खंडित करता है।
वैदिक पुनरुत्थान की आवश्यकता   आज जब सूर्य नमस्कार, गायत्री जप को बढ़ावा दिया जा रहा है, तब छठ                                                    जैसे जीवंत सूर्य पर्व को राष्ट्रीय स्तर पर अपनाना चाहिए।

सार : सभी सनातनी इसे अपना सकते हैं जो वैदिक परंपरा में विश्वास करते हैं, वे सूर्य को जीवनदाता मानकर छठ मना सकते हैं।

क्षेत्रीयता नहीं, श्रद्धा और शुद्धता महत्वपूर्ण है।

दक्षिण भारत में पोंगल, बंगाल में छेरा पूजा, गुजरात में सूर्यव्रत –
सब सूर्य पूजा के रूप हैं। छठ भी उसी श्रृंखला का हिस्सा है।

इसे राष्ट्रीय पर्व बनाने की दिशा में प्रयास होना चाहिए – जैसे छठ घाट दिल्ली में बन रहे हैं, वैसे ही हर राज्य में सूर्य मंदिरों पर अर्घ्य दान की परंपरा शुरू हो।

मूल श्लोक (ऋग्वेद) : 
येन सूर्य ज्योतिषा बाधसे तमो जगच्च विश्वमुदियर्षि भानुना। 
तेनास्मद् विश्वामनिरामनाहुतिमपामीवामप दुष्ष्वप्न्यं सुव॥

भावार्थ:
आप जिस सूर्य के प्रकाश से अंधकार को दूर कर सारी दुनिया को रोशन करते हैं, उसी से हमारे सभी कष्टों, रोगों और बुरे कर्मों को दूर करें।

इससे यह स्पष्ट होता है कि जिस सूर्य से अंधकार दूर होता है, उसकी उपासना सभी आर्यों का कर्तव्य है।
छठ केवल बिहार का नहीं, वैदिक भारत का पर्व है।

 

अस्वीकरण (Disclaimer):

इस लेख में वैदिक साहित्य, पुराणों, और विभिन्न समुदायों के योगदान का उल्लेख छठ पूजा की सांस्कृतिक, धार्मिक और सामाजिक महत्ता को रेखांकित करने के लिए किया गया है। सभी उल्लेख सम्मानजनक और समावेशी भावना के साथ हैं, जिनका उद्देश्य सामाजिक समरसता और परंपराओं को बढ़ावा देना है। किसी भी समुदाय, मंत्र या कथा का उल्लेख किसी को अपमानित करने या भेदभाव करने के इरादे से नहीं है। यह लेख भारत के संवैधानिक मूल्यों के अनुरूप है। यदि किसी को कोई आपत्ति हो, तो वह अनजाने में हुई होगी, और हम इसके लिए खेद व्यक्त करते हैं।

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