भारतीय आयुर्वेद और चिकित्सा पद्धति: एक ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य और अंग्रेजी चिकित्सा के प्रभाव पर विश्लेषण

भारतीय आयुर्वेद और चिकित्सा पद्धति: एक ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य और अंग्रेजी चिकित्सा के प्रभाव पर विश्लेषण

भारतीय चिकित्सा पद्धति, विशेष रूप से आयुर्वेद, प्राचीनकाल से ही समृद्ध और वैज्ञानिक रही है। हमारे देश में आयुर्वेद के विविध ग्रंथों में प्राकृतिक चिकित्सा, औषधियों के प्रयोग, शल्य चिकित्सा, और योगासन के सिद्धांतों का गहन वर्णन मिलता है। इन ग्रंथों का उद्देश्य शरीर, मन और आत्मा के बीच सामंजस्य स्थापित करना है, जो स्वास्थ्य को बनाए रखने के लिए आवश्यक है। भारतीय चिकित्सा पद्धति की समृद्धि को देखते हुए यह सवाल उठता है कि भारत में अंग्रेजी औषधि पद्धतियों के बढ़ते प्रभाव के बावजूद हमारी पारंपरिक चिकित्सा को बढ़ावा क्यों नहीं मिला? क्या इसका कारण पिछले शासकों की उपेक्षा रही?

1. ऋग्वेद (रचयिता: महर्षि वेद व्यास)

ऋग्वेद भारतीय संस्कृति के प्राचीनतम ग्रंथों में से एक है, जिसमें औषधियों और उपचार विधियों का उल्लेख मिलता है। इसमें प्राकृतिक चिकित्सा, मंत्रों का उपयोग और जीवन के विभिन्न पहलुओं का विस्तार से वर्णन किया गया है। ऋग्वेद में मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य के लिए औषधियों और उपचार विधियों का निर्देश मिलता है, जो आयुर्वेद के मूल सिद्धांतों के साथ मेल खाते हैं।

2. अथर्ववेद (रचयिता: महर्षि अथर्वण और अंगिरा)

अथर्ववेद आयुर्वेद और तंत्र-मंत्र की चिकित्सा पद्धतियों पर आधारित है। इसमें औषधियों, जड़ी-बूटियों, और उपचार के बारे में जानकारी दी गई है, जो आयुर्वेद में स्वास्थ्य का संरक्षण करने की प्रमुख विधियाँ हैं। यह वेद विशेष रूप से तंत्र और मंत्रों के उपयोग से शरीर और आत्मा के उपचार पर जोर देता है।

3. चरक संहिता (रचयिता: महर्षि चरक)

यह ग्रंथ आयुर्वेद का सबसे महत्वपूर्ण ग्रंथ है। इसमें रोगों का निदान, उपचार, आहार-विहार और शरीर के अंगों के कार्यों के बारे में विस्तार से वर्णन किया गया है। चरक संहिता में जीवनशक्ति और स्वास्थ्य के महत्व पर गहरी समझ दी गई है और इसे आयुर्वेद का आधार माना जाता है। यह ग्रंथ विशेष रूप से समग्र स्वास्थ्य और शरीर की स्वच्छता पर जोर देता है।

4. सुश्रुत संहिता (रचयिता: महर्षि सुश्रुत)

सुश्रुत संहिता शल्य चिकित्सा (सर्जरी) के क्षेत्र में प्रमुख ग्रंथ है। इसमें विभिन्न शल्य क्रियाओं, घावों के उपचार और हड्डी जोड़ने की विधियों का उल्लेख किया गया है। महर्षि सुश्रुत को शल्य चिकित्सा का पिता माना जाता है, और यह ग्रंथ सर्जरी के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

5. अष्टांग हृदयम और अष्टांग संग्रह (रचयिता: आचार्य वाग्भट)

इन दोनों ग्रंथों में आयुर्वेद के आठ प्रमुख चिकित्सा प्रणालियों का विस्तृत वर्णन किया गया है। इसमें आहार, विहार, योग, और जीवनशैली की सही विधियाँ दी गई हैं, जो शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य बनाए रखने के लिए आवश्यक हैं।

6. कश्यप संहिता (रचयिता: महर्षि कश्यप)

कश्यप संहिता शिशु चिकित्सा, स्त्री रोग और बच्चों के स्वास्थ्य पर आधारित है। इसमें गर्भावस्था, प्रसव, शिशु पालन और स्त्री रोगों के उपचार पर विशेष ध्यान दिया गया है। यह ग्रंथ आयुर्वेद में बच्चों और महिलाओं के स्वास्थ्य के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।

7. धन्वंतरि संहिता (रचयिता: भगवान धन्वंतरि)

भगवान धन्वंतरि आयुर्वेद के देवता माने जाते हैं। उनकी संहिता में औषधियों, उपचार विधियों और जीवनशैली के बारे में मार्गदर्शन दिया गया है। यह ग्रंथ विशेष रूप से औषधियों के गुण और उनके उचित प्रयोग पर केंद्रित है।

8. गरुड़ पुराण और अग्नि पुराण (रचयिता: महर्षि वेद व्यास)

इन पुराणों में आयुर्वेदिक दृष्टिकोण से जीवनशक्ति, स्वास्थ्य, मृत्यु और उपचार के बारे में विस्तार से जानकारी दी गई है। इनमें तंत्र-मंत्र, औषधियों के उपयोग और उनके मानसिक एवं शारीरिक लाभों का उल्लेख किया गया है।

9. योग रत्नाकर, रसार्णव और निघंटु (रचयिता: निस्संकेत)

ये ग्रंथ योग, तंत्र-मंत्र और रसायन विज्ञान के महत्व पर आधारित हैं। इनमें औषधियों के मिश्रण, उनके उपचार गुण, और शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य की देखभाल के तरीके बताए गए हैं। इन ग्रंथों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण से शरीर और मन के उपचार के सिद्धांतों का पालन किया गया है।

10. स्वास्थ्य और योग से संबंधित अन्य महत्वपूर्ण ग्रंथ

ग्रंथ जैसे हठ योग प्रदीपिका (रचयिता: स्वात्माराम), वातव्याधि चिकित्सा, आयुर्वेद प्रकाश (रचयिता: माधवकर), और तंत्र युक्ति (रचयिता: निस्संकेत) योग, हठ योग, तंत्र-मंत्र और औषधियों के उपयोग पर आधारित हैं। इन ग्रंथों में शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के लिए उपाय और उपायों का वर्णन किया गया है।



भारत में आयुर्वेद के प्रभाव की उपेक्षा और अंग्रेजी चिकित्सा का प्रचार

भारत में आयुर्वेद और भारतीय चिकित्सा पद्धतियों का समृद्ध इतिहास रहा है। फिर भी, ब्रिटिश काल में औषधीय पद्धतियों के क्षेत्र में बदलाव आया, खासकर अंग्रेजी चिकित्सा प्रणाली के प्रवेश के साथ। अंग्रेजों ने भारतीय चिकित्सा पद्धतियों को उपेक्षित किया और यूरोपीय चिकित्सा पद्धतियों को बढ़ावा दिया। इस उपेक्षात्मक दृष्टिकोण का प्रभाव आज भी देखने को मिलता है, जहां भारतीय समाज में अंग्रेजी दवाओं और चिकित्सा पद्धतियों को प्राथमिकता दी जाती है।

ब्रिटिश शासकों ने आयुर्वेद के विकास के लिए अपेक्षित समर्थन नहीं दिया और भारतीय चिकित्सा पद्धतियों के बजाय पश्चिमी चिकित्सा पद्धतियों को लागू करने में ध्यान केंद्रित किया। इसके परिणामस्वरूप, भारतीय चिकित्सा पद्धतियों की शिक्षा और प्रचार-प्रसार पर कमी आई, और औषधि निर्माण का क्षेत्र पश्चिमी कंपनियों के हाथ में चला गया।

आज, जबकि भारत में आयुर्वेदिक ज्ञान की प्रचुरता है और हम अपनी पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों पर गर्व महसूस करते हैं, फिर भी भारतीय बाजार में विदेशी दवाओं और चिकित्सा पद्धतियों का दबदबा है। यह समय की आवश्यकता है कि हम अपनी प्राचीन चिकित्सा पद्धतियों को फिर से महत्व दें और उनका अधिक व्यापक उपयोग करें।

यह लेख इस विचार को प्रस्तुत करता है कि हमारे समृद्ध चिकित्सा ज्ञान और आयुर्वेदिक ग्रंथों के होते हुए भी, पिछली शासकीय नीतियों के कारण, हम पश्चिमी चिकित्सा पद्धतियों की ओर प्रवृत्त हुए। अब समय है कि हम अपनी पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों को पुनः स्थापित करें और वैश्विक स्तर पर आयुर्वेद को एक प्रमुख चिकित्सा पद्धति के रूप में पहचान दिलाएं।

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