भारत-बांग्लादेश सीमा पर संभावित हिन्दू शरणार्थियों के पुनर्वास के लिए एक नया दृष्टिकोण


श्री नरेंद्र मोदी जी को प्रणाम!

बांग्लादेश की मौजूदा स्थिति को देखते हुए और बांग्लादेशी हिंदुओं के भारत वापसी की मीडिया और सोशल मीडिया में हो रही चर्चाओं के मद्देनजर, मेरे मन में एक विचार आया है जिसे मैं आपके समक्ष प्रस्तुत करना चाहता हूँ।

मेरी बातों को बिल्कुल उसी प्रकार से देखें जैसे परिवार का कोई सदस्य अपने अभिभावक (परिवार के मुखिया) को कोई सुझाव देता है। विचार करने के बाद यदि सुझाव उचित लगे तो उसे कार्यान्वित किया जाए, अन्यथा मुखिया के द्वारा "यह उचित नहीं होगा" कहकर सुझाव को इग्नोर कर दिया जाए।

विचार:

बांग्लादेश से जो हिंदू शरणार्थी बनकर भारत आना चाहते हैं, उनकी बांग्लादेश में कुल जमीन और संपत्ति की गणना करके, उसी के बराबर क्षेत्रफल की जमीन बांग्लादेश भारत को सौंप दे। इसके बाद, भारत तुरंत प्रभाव से उस जमीन पर फेंसिंग करके अपने अधिकार में ले ले और शरणार्थियों के पुनर्वास के लिए निर्माण कार्य शुरू करे। ऐसा करने से शरणार्थियों को टीन और प्लास्टिक के बोरियों से बने घरों में नहीं रहना पड़ेगा और उन्हें शरणार्थी का टैग भी नहीं पहनना पड़ेगा। यह एक ऐतिहासिक घटना बनेगी और जहां भी विस्थापन की त्रासदी होगी, वहां यह एक उदाहरण के रूप में काम करेगा।

अन्यथा विस्तारवाद की घृणित सोच का खात्मा अनंत काल तक भी संभव नहीं होगा। मुझे नहीं मालूम कि इसके लिए कौन सी फॉरेन पॉलिसी होगी, और मुझे यह भी नहीं मालूम कि इस सेंसिटिव मसले पर विश्व की किस अदालत में बहस होगी। नहीं मालूम कि कितने देश इस तरह के फैसले पर मुहर लगाएंगे, लेकिन यदि यह संभव हो सका, तो यकीन मानिए, इस तरह की घटनाएं बंद हो जाएंगी। जो भी नियम और कानून बनाए जाते हैं, वे मानव जीवन को बेहतर बनाने के दृष्टिकोण से बनाये जाते हैं।

ह्यूमैनिटी ग्राउंड पर सोचकर देखिए कि यदि एक ही पद के दो दावेदार महत्वाकांक्षी राजनेता या दो राजनीतिक पक्ष एक ही समय में एक ही कुर्सी पर बैठना चाहते हैं, तो ऐसे में वे देश का विभाजन या तख्ता पलट कर ही अपने संकल्प को सिद्ध करेंगे। लेकिन उसके बाद निर्दोष जनता की जो जानवरों जैसी हालत होती है, उसके लिए भी हमें सोचना चाहिए। सिर्फ "वसुधैव कुटुम्बकम" मंत्र जपने से विश्व हमारा परिवार नहीं हो जाएगा। यदि इस मंत्र को सिद्ध करना है, तो विश्वकल्याण सम्मत कार्य करने होंगे।

मेरे इस विचार से आपको क्षणिक ऐसा लगेगा कि ये मूर्खतापूर्ण है, असंभव बात कर रहा है। तो हे महामानव, हम आपको याद दिलाना चाहते हैं कि आज तक आपने जो भी किया है, वे पहले असंभव ही थे, लेकिन आपने उन्हें संभव कर दिखाया। अतः आपसे करबद्ध निवेदन है कि इस पर चिंतन करने की कृपा करें। हमारे देश में विद्वता और विद्वानों की कोई कमी नहीं है। सभी एक मत होकर सोचेंगे, तो यह बिलकुल संभव हो पाएगा, ऐसा मेरा विश्वास है।

प्रस्ताव का सारांश:

बांग्लादेश से हिंदू शरणार्थी बनकर भारत आने वाले सभी लोगों की बांग्लादेश में कुल संपत्ति का आकलन किया जाए। इसके बराबर क्षेत्रफल की जमीन बांग्लादेश द्वारा भारत को सौंप दी जाए, जिसे भारत अपने नियंत्रण में लेकर शरणार्थियों के पुनर्वास के लिए उपयोग में ला सके।

प्रस्ताव की मुख्य विशेषताएं:

संपत्ति का मूल्यांकन:

  • बांग्लादेश में हिंदू शरणार्थियों की कुल संपत्ति का सही आकलन किया जाए।
  • यह संपत्ति जमीन, मकान, और अन्य प्रकार की संपत्ति हो सकती है।

जमीन की अदला-बदली:

  • बांग्लादेश उसी मूल्य और क्षेत्रफल की जमीन भारत को सौंपे।
  • यह जमीन बांग्लादेश-भारत सीमा के पास होनी चाहिए ताकि इसे आसानी से भारत में समाहित किया जा सके।

पुनर्वास और निर्माण:

  • भारत इस जमीन पर तुरंत फेंसिंग करे और अपने नियंत्रण में ले ले।
  • शरणार्थियों के पुनर्वास के लिए इस जमीन पर कंस्ट्रक्शन शुरू किया जाए ताकि उन्हें उचित आवास मिल सके।

अंतर्राष्ट्रीय समर्थन:

  • इस प्रस्ताव को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रस्तुत किया जाए ताकि इसे मान्यता और समर्थन प्राप्त हो सके।
  • संयुक्त राष्ट्र और अन्य अंतर्राष्ट्रीय संगठनों का समर्थन प्राप्त किया जाए।

प्रस्ताव की प्रक्रिया:

कूटनीतिक वार्ता:

  • भारत और बांग्लादेश के बीच उच्चस्तरीय वार्ता की शुरुआत की जाए।
  • दोनों देशों के विदेश मंत्रालयों और संबंधित अधिकारियों के बीच संवाद आवश्यक होगा।

सर्वेक्षण और डेटा संग्रह:

  • बांग्लादेश में हिंदू शरणार्थियों की संपत्ति का सर्वेक्षण और आकलन किया जाए।
  • एक संयुक्त सर्वेक्षण टीम का गठन किया जाए।

कानूनी ढाँचा:

  • इस पूरी प्रक्रिया के लिए एक सुदृढ़ कानूनी ढाँचा तैयार किया जाए।
  • दोनों देशों के संविधानों और अंतर्राष्ट्रीय कानूनों का पालन किया जाए।

अंतर्राष्ट्रीय समर्थन:

  • संयुक्त राष्ट्र और अन्य अंतर्राष्ट्रीय संगठनों से समर्थन प्राप्त किया जाए।
  • इससे इस प्रक्रिया को वैधता और व्यापक स्वीकृति प्राप्त हो सकेगी।

जन समर्थन:

  • इस विचार को व्यापक जनसमर्थन प्राप्त करने के लिए विभिन्न मंचों पर चर्चा और संवाद की शुरुआत की जाए।
  • इससे लोगों की समझ और समर्थन प्राप्त होगा।

पुनर्वास योजनाएँ:

  • पुनर्वासित शरणार्थियों के लिए विस्तृत योजनाएँ बनाई जाएं।
  • इसमें आवास, स्वास्थ्य, शिक्षा और अन्य बुनियादी आवश्यकताओं का समुचित प्रावधान शामिल हो।

संभावित चुनौतियाँ और समाधान:

विधिक चुनौतियाँ:

  • इस प्रकार की भूमि स्वैपिंग और पुनर्वास प्रक्रिया के लिए एक स्पष्ट और सुदृढ़ कानूनी आधार आवश्यक होगा।

संप्रभुता और कूटनीति:

  • भारत और बांग्लादेश के बीच अच्छे कूटनीतिक संबंध बनाए रखना अत्यंत महत्वपूर्ण है।

प्रभावित लोगों की सहमति:

  • इस प्रक्रिया में शामिल सभी शरणार्थियों और अन्य प्रभावित लोगों की सहमति और समर्थन प्राप्त करना भी महत्वपूर्ण होगा।

अंतर्राष्ट्रीय समर्थन और निगरानी:

  • इस प्रक्रिया में अंतर्राष्ट्रीय संगठनों, जैसे संयुक्त राष्ट्र, का समर्थन और निगरानी भी शामिल हो सकती है।

निष्कर्ष:

मेरा विचार है कि यह प्रक्रिया निश्चित रूप से चुनौतीपूर्ण होगी, लेकिन सही दृष्टिकोण और समर्पण के साथ इसे सफलतापूर्वक लागू किया जा सकता है। यदि यह संभव हो पाया तो वैश्विक मंच पर मानवता की सेवा और शरणार्थियों के कल्याण के इस प्रयास के लिए एक महत्वपूर्ण कदम साबित होगा। मुझे विश्वास है कि इसे सही तरीके से लागू किया गया तो यह एक ऐतिहासिक और उदाहरणात्मक घटना बन सकती है।

धन्यवाद,

बिमलेंद्र झा

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